भारतीय अधिवक्ताओं के लिए 'लिखित कथन' (Written Statement) पर एक विस्तृत और व्यावहारिक मार्गदर्शिका (Comprehensive Guide):
भारतीय सिविल मुकदमों में 'लिखित कथन' (Written Statement) पर व्यापक मार्गदर्शिका
1. परिचय (Introduction)
सिविल मुकदमों की प्रक्रिया में लिखित कथन (Written Statement) प्रतिवादी (Defendant) का वह मुख्य आधिकारिक दस्तावेज होता है जिसके माध्यम से वह वादी (Plaintiff) द्वारा वाद पत्र (Plaint) में लगाए गए आरोपों, दावों और तथ्यों का उत्तर देता है।
यह क्या है: यह प्रतिवादी का रक्षात्मक जवाब है, जिसमें वह अपनी स्थिति स्पष्ट करता है, वादी के दावों को स्वीकार या अस्वीकार करता है, और अपने पक्ष के तथ्य रखता है। यह कब उपयोग किया जाता है: जब सिविल न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को समन (Summons) जारी किया जाता है और प्रतिवादी अदालत में पेश होकर वाद पत्र का जवाब देना चाहता है, तब लिखित कथन दाखिल किया जाता है।
2. विधिक ढांचा (Legal Framework)
दीवानी मुकदमों में लिखित कथन से संबंधित मुख्य प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के तहत दिए गए हैं:
आदेश 8, नियम 1 (Order VIII, Rule 1 CPC): लिखित कथन दाखिल करने की समय-सीमा। समन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर यह दाखिल किया जाना चाहिए। हालांकि, विशेष कारणों से अदालत इसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ा सकती है (वाणिज्यिक मुकदमों में नियम और सख्त हैं)। आदेश 8, नियम 3 & 5 (Order VIII, Rules 3 & 5 CPC): विशिष्ट अस्वीकृति (Specific Denial) का नियम। प्रतिवादी को वादी के प्रत्येक आरोप का स्पष्ट और विशिष्ट उत्तर देना होगा; गोलमोल या अस्पष्ट इनकार को आरोपों की स्वीकृति (Admission) मान लिया जाता है। आदेश 8, नियम 6 (Order VIII, Rule 6 CPC): मुकदमों में मुकदमता या मुजरा (Set-off) का दावा। आदेश 8, नियम 6A (Order VIII, Rule 6A CPC): प्रतिदावा (Counter-claim) दाखिल करने का अधिकार।
(नोट: चूंकि यह विशुद्ध रूप से सिविल प्रक्रिया का विषय है, इसलिए BNS, BNSS या BSA के आपराधिक/साक्ष्य कानून के बजाय CPC यहाँ मुख्य रूप से लागू होता है। साक्ष्य अधिनियम की धाराएं [अब BSA] तथ्यों को साबित करने में मदद करती हैं।
3. मुख्य घटक (Key Components of a Written Statement)
एक प्रभावी लिखित कथन में निम्नलिखित भाग होने अनिवार्य हैं:
न्यायालय का शीर्षक (Cause Title): अदालत का नाम, वाद संख्या (Suit Number), और वादी बनाम प्रतिवादी का विवरण।
प्रारंभिक आपत्तियां (Preliminary Objections): वाद की ग्राह्यता (Maintainability) पर सवाल, जैसे- अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का अभाव, सीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत वाद का बाधित होना, वादी के पास वाद लाने का अधिकार (Locus Standi) न होना, या आवश्यक पक्षों (Necessary Parties) का न होना।
पैरा-वार उत्तर (Para-wise Reply on Merits): वाद पत्र के प्रत्येक पैराग्राफ का क्रमानुसार खंडन या स्वीकारोक्ति।
प्रतिदावा या सेट-ऑफ (यदि कोई हो): यदि प्रतिवादी को वादी से कोई धन लेना है या कोई अन्य अधिकार है।
सत्यापन (Verification): प्रतिवादी द्वारा शपथ पूर्वक यह घोषणा कि लिखित कथन के पैराग्राफ उसकी जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
हस्ताक्षर और वकालतनामा: अधिवक्ता और प्रतिवादी के हस्ताक्षर।
4. मानक प्रारूप / टेम्पलेट (Standard Format Template)
न्यायालय: [न्यायाधीश का पदनाम और जिले का नाम]
सिविल वाद संख्या: / 20
श्री [वादी का नाम] ................... वादी (Plaintiff) बनाम श्री [प्रतिवादी का नाम] ................... प्रतिवादी (Defendant)
वादी द्वारा प्रस्तुत वाद-पत्र के उत्तर में प्रतिवादी की ओर से लिखित कथन (Written Statement on behalf of the Defendant)
माननीय महोदय,
प्रतिवादी उपरोक्त मामले में निम्नलिखित लिखित कथन प्रस्तुत करता है:
प्रारंभिक आपत्तियां (Preliminary Objections):
यह कि प्रस्तुत वाद माननीय न्यायालय के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) के बाहर है, अतः यह खारिज होने योग्य है।
यह कि प्रस्तुत वाद सीमा अधिनियम (Limitation Act) के प्रावधानों से पूरी तरह बाधित (Time-barred) है।
यह कि वादी के पास इस वाद को संस्थित करने का कोई विधिक अधिकार (Cause of Action) उत्पन्न नहीं हुआ है।
पैरा-वार उत्तर (Para-wise Reply on Merits):
वाद-पत्र के पैरा संख्या 1 के संबंध में यह स्वीकार किया जाता है कि... (तथ्य स्वीकार करें या अस्वीकार करें)।
वाद-पत्र के पैरा संख्या 2 में कही गई बातें असत्य, मनगढ़ंत और अस्वीकृत हैं। वादी को इसके विपरीत साबित करना होगा कि...।
इस वाद के पैरा संख्या 3 के संबंध में प्रतिवादी का यह कथन है कि... (अपने पक्ष के तथ्य रखें)।
विशेष कथन (Additional Pleas):
यह कि प्रतिवादी ने कभी भी... (मुख्य रक्षात्मक बिंदु)।
प्रार्थना (Prayer):
अतः प्रतिवादी विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करता है कि माननीय न्यायालय वादी के वाद-पत्र को भारी खर्च के साथ खारिज (Dismiss with costs) करने की कृपा करें।
दिनांक: [तारीख] स्थान: [शहर का नाम]
प्रतिवादी
(हस्ताक्षर)
अधिवक्ता महोदय
(हस्ताक्षर और मुहर)
सत्यापन (Verification):
मैं, [प्रतिवादी का नाम], पुत्र [पिता का नाम], निवासी [पता], एतद्वारा सत्यापित करता हूँ कि इस लिखित कथन के पैरा 1 से लेकर [संख्या] तक की बातें मेरी व्यक्तिगत जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं और इसमें कुछ भी छुपाया नहीं गया है।
दिनांक: स्थान:
(प्रतिवादी के हस्ताक्षर)
5. याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें (Important Points to Remember)
समय सीमा का ध्यान रखें: विलंब शुल्क (Condonation of delay) के लिए मजबूत आधार तैयार रखें, विशेषकर 30 दिन की अवधि के बाद। विशिष्ट इनकार (Specific Denial): कभी भी सामान्य खंडन (General Denial) न करें। यदि वादी कहता है कि "प्रतिवादी ने 1 जनवरी को 50,000 रुपये लिए," तो आपको स्पष्ट रूप से कहना होगा कि "1 जनवरी को कोई राशि नहीं ली गई।" दस्तावेजों को संलग्न करें: यदि आप अपने बचाव में किसी समझौते या रसीद का हवाला दे रहे हैं, तो उसकी सूची (List of Documents) संलग्न करें। प्रतिदावा (Counter-claim): यदि वादी के खिलाफ आपका कोई दावा बनता है, तो लिखित कथन में ही काउंटर-claim जोड़ना फायदेमंद होता है, जिससे समय और फीस की बचत होती है।
6. बचने योग्य सामान्य गलतियां (Common Mistakes to Avoid)
गोलमोल जवाब देना: केवल यह लिख देना कि "वाद-पत्र की सभी बातें झूठी हैं," सीपीसी के नियमों के खिलाफ है और इसे आरोपों की स्वीकृति माना जा सकता है।
तथ्यों में विरोधाभास (Contradictory Pleadings): एक पैराग्राफ में कहना कि "मैंने अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए" और दूसरे में कहना कि "अनुबंध दबाव में कराया गया था," एक घातक गलती है।
सत्यापन का अभाव: बिना उचित सत्यापन (Verification) और शपथ पत्र (Affidavit) के लिखित कथन कानूनी रूप से अधूरा है।
अधिवक्ता के हस्ताक्षर न होना: ड्राफ्टिंग के बाद अधिवक्ता और पक्षकार दोनों के हस्ताक्षर और नामांकित बार काउंसिल संख्या होना अनिवार्य है।
7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: यदि प्रतिवादी निर्धारित 30 या 90 दिनों के भीतर लिखित कथन दाखिल करने में विफल रहता है, तो क्या होगा?
उत्तर: आदेश 8 नियम 1 CPC के तहत, 90 दिनों की अधिकतम सीमा समाप्त होने के बाद प्रतिवादी का लिखित कथन दाखिल करने का अधिकार समाप्त (Forfeited) हो जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कुछ असाधारण मामलों के निर्णयों को छोड़कर, अदालतें सामान्यतः समय बढ़ाने से इनकार कर सकती हैं।
Q2: क्या लिखित कथन में संशोधन (Amendment) किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, आदेश 6 नियम 17 CPC के तहत न्यायालय की अनुमति से लिखित कथन में संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते यह साबित किया जा सके कि तमाम उचित सावधानी के बावजूद यह तथ्य पहले नहीं जोड़ा जा सका था और इससे मुकदमी की प्रकृति नहीं बदलती।
Q3: सेट-ऑफ (Set-off) और प्रतिदावा (Counter-claim) में क्या अंतर है?
उत्तर: 'सेट-ऑफ' तब होता है जब प्रतिवादी वादी द्वारा मांगे गए धन में से उतनी ही राशि अपनी तरफ काट लेने की मांग करता है जितनी वादी उस पर बकाया बताता है। 'प्रतिदावा' (Counter-claim) एक स्वतंत्र दावे की तरह होता है जिसमें प्रतिवादी वादी से अतिरिक्त राशि या राहत की मांग कर सकता है।
Q4: क्या लिखित कथन के साथ शपथ पत्र (Affidavit) देना अनिवार्य है?
उत्तर: जी हाँ, कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत यह अनिवार्य है, और सामान्य सिविल न्यायालयों में भी कमर्शियल मामलों की तर्ज पर अब लिखित कथन के समर्थन में सत्यनिष्ठा का शपथ पत्र देना एक स्थापित प्रैक्टिस बन गई है।
Q5: यदि वादी वाद वापस ले लेता है, तो क्या प्रतिवादी का लिखित कथन या प्रतिदावा समाप्त हो जाता है?
उत्तर: यदि लिखित कथन में कोई 'प्रतिदावा' (Counter-claim) दाखिल किया गया है, तो वादी के वाद वापस लेने से प्रतिदावा स्वतः समाप्त नहीं होता; अदालत उस पर अलग से सुनवाई जारी रख सकती है (आदेश 8 नियम 6A(4) CPC)।