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Revision Format

भारतीय वकीलों के लिए 'पुनरीक्षण' (Revision) पर एक व्यापक और विस्तृत विधिक मार्गदर्शिका।

भारतीय न्यायविदों के लिए 'पुनरीक्षण' (Revision) पर व्यापक मार्गदर्शिका

1. परिचय (Introduction)

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में पुनरीक्षण (Revision) एक महत्वपूर्ण विधिक उपाय (Legal Remedy) है। जब किसी निचली अदालत (Trial Court या Sessions Court) द्वारा दिए गए किसी आदेश, निर्णय या कार्यवाही में अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) की कोई अवैधता, प्रक्रियात्मक त्रुटि (Procedural Irregularity), या न्याय की गंभीर विफलता (Miscarriage of Justice) होती है, तब उच्च न्यायालय (High Court) या सत्र न्यायालय (Sessions Court) के समक्ष 'पुनरीक्षण याचिका' (Revision Petition) दाखिल की जाती है।

यह समझना आवश्यक है कि पुनरीक्षण और अपील (Appeal) में अंतर है। अपील एक वैधानिक अधिकार है जहाँ तथ्यों और कानून दोनों पर बहस होती है, जबकि पुनरीक्षण अदालत की एक पर्यवेक्षी शक्ति (Supervisory Jurisdiction) है, जिसका उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि निचली अदालतें अपने कानूनी दायरे में रहकर काम कर रही हैं या नहीं।

कब इसका उपयोग किया जाता है:

जब किसी मामले में 'अपील' का प्रावधान नहीं होता (विशेषकर इंटरलोक्यूटरी या मध्यवर्ती आदेशों के मामले में)। जब निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र का अवैध प्रयोग किया हो या अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने से इनकार किया हो। जब किसी आदेश से न्याय का गला घोंटा जा रहा हो।

2. विधिक ढाँचा (Legal Framework)

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) के प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अंतर्गत शासित होते हैं। पुनरीक्षण से संबंधित मुख्य धाराएँ निम्नलिखित हैं:

धारा 438 BNSS (पुरानी धारा 397 CrPC): सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण शक्तियाँ। इसके तहत अदालतें किसी भी निचली अदालत के रिकॉर्ड को मंगाकर उसकी जाँच कर सकती हैं। धारा 439 BNSS (पुरानी धारा 398 CrPC): उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण की शक्तियों का दायरा और आदेश पारित करने की प्रक्रिया। धारा 440 BNSS (पुरानी धारा 399 CrPC): सत्र न्यायाधीश की पुनरीक्षण शक्तियाँ। धारा 442 BNSS (पुरानी धारा 401 CrPC): उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण शक्ति का प्रयोग करते समय सुनी जाने वाली पक्षकारों की स्थिति (सुनवाई का अवसर)।

(नोट: साक्ष्य अधिनियम के लिए अब 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' (BSA) लागू होता है, लेकिन पुनरीक्षण मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक कानून (BNSS) द्वारा नियंत्रित होता है।)

3. मुख्य घटक (Key Components)

एक प्रभावी पुनरीक्षण याचिका में निम्नलिखित घटकों का होना अनिवार्य है:

उचित शीर्षक (Cause Title): न्यायालय का नाम, पुनरीक्षण याचिकाकर्ता (Petitioner/Revisionist) और विपक्षी (Respondent/State) का विवरण।

आदेश का विवरण: उस आदेश की तिथि, न्यायालय का नाम और न्यायाधीश का नाम जिसके विरुद्ध पुनरीक्षण दायर किया जा रहा है।

परिसीमा (Limitation): यद्यपि CrPC/BNSS में पुनरीक्षण के लिए कोई सख्त परिसीमा अधिनियम लागू नहीं होता, लेकिन याचिका उचित समय (सामान्यतः 90 दिनों के भीतर) के भीतर और बिना किसी अनुचित देरी (Laches) के दायर की जानी चाहिए।

तथ्यों का संक्षिप्त विवरण (Statement of Facts): मामले की पृष्ठभूमि और निचली अदालत में क्या हुआ, इसका संक्षिप्त विवरण।

कानूनी आधार (Grounds of Revision): यह याचिका का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें यह दर्शाया जाना चाहिए कि निचली अदालत ने कानून की अवहेलना कहाँ की है।

अंतरिम राहत (Interim Relief): यदि आवश्यक हो, तो निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक (Stay) या गिरफ्तारी पर रोक के लिए प्रार्थना।

प्रार्थना खंड (Prayer Clause): न्यायालय से स्पष्ट राहत की माँग।

4. मानक प्रारूप / टेम्पलेट (Standard Format Template)

भारत के माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष

(आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार)

आपराधिक पुनरीक्षण संख्या वर्ष 2024

अन्तर्गत धारा 438/442 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS)

इन द मैटर ऑफ:

ABC पुत्र श्री XYZ, आयु- लगभग 45 वर्ष, निवासी- मकान नंबर 123, सिविल लाइंस, नई दिल्ली। ... पुनरीक्षणकर्ता (Petitioner)

बनाम

राज्य (State of NCT of Delhi)

PQR पुत्र श्री LMN,

निवासी- 456, कनाट प्लेस, नई दिल्ली। ... विपक्षीगण (Respondents)

आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (CRIMINAL REVISION PETITION)

सेवा में,

माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं उनके अन्य साथी न्यायाधीशगण, माननीय उच्च न्यायालय, दिल्ली।

विनम्र निवेदन है कि:

यह कि पुनरीक्षणकर्ता, निचली अदालत (श्री [न्यायधीश का नाम], अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पटियाला हाउस कोर्ट, नई दिल्ली) द्वारा पारित आदेश दिनांक [दिनांक] के विरुद्ध यह याचिका प्रस्तुत कर रहा है।

यह कि मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं: [यहाँ मामले के मुख्य तथ्य संक्षेप में लिखें]।

यह कि निचली अदालत ने दिनांक [दिनांक] को एक आदेश पारित किया जिसके द्वारा [आदेश का विवरण दें, जैसे कि आरोप तय करना या डिस्चार्ज आवेदन खारिज करना आदि]।

पुनरीक्षण के मुख्य आधार (GROUNDS FOR REVISION):

क. चूँकि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों (BSA के प्रावधानों के तहत) का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया, अतः आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है। ख. चूँकि विद्वान न्यायाधीश ने अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में गंभीर विधिक त्रुटि की है। ग. चूँकि आदेश पारित करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन किया गया है।

यह कि पुनरीक्षणकर्ता ने इस न्यायालय के समक्ष पहले ऐसा कोई अन्य पुनरीक्षण या याचिका दायर नहीं की है।

अंतरिम राहत (Interim Prayer):

सुनवाई के लंबित रहने के दौरान, यह प्रार्थना की जाती है कि निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाई जाए।

प्रार्थना (PRAYER)

अतः माननीय न्यायालय से करबद्ध प्रार्थना है कि इस पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए, निचली अदालत द्वारा पारित आदेश दिनांक [दिनांक] को अपास्त (Set aside) करने की कृपा करें, अथवा न्यायालय उचित समझे वैसा अन्य आदेश पारित करें।

दिनांक: [स्थान] स्थान: [दिनांक]

अधिवक्ता द्वारा हस्ताक्षरित

(कौशल का नाम / अधिवक्ता) नामांकन संख्या (Enrolment No.)

5. याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बिंदु (Important Points to Remember)

द्वितीय पुनरीक्षण पर रोक (Bar on Second Revision): धारा 438(3) BNSS के अनुसार, यदि एक बार सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका खारिज हो जाती है, तो वही पक्षकार उच्च न्यायालय में दूसरा पुनरीक्षण दायर नहीं कर सकता। दस्तावेज़ संलग्न करें: निचली अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) और आरोप पत्र (Charge Sheet) या संबंधित दस्तावेजों की प्रतियाँ अवश्य संलग्न करें। लंबित मामलों में सतर्कता: यदि आदेश 'अंतिम आदेश' (Final Order) नहीं है, बल्कि 'मध्यवर्ती आदेश' (Intermediate Order) है, तभी पुनरीक्षण पोషణीय (Maintainable) है (सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Asian Resurfacing और Madhu Limaye v. State of Maharashtra के अनुसार)।

6. बचने योग्य सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes to Avoid)

गलत धारा का उल्लेख करना: पुरानी CrPC की धारा 397/401 के स्थान पर नई BNSS की धारा 438/442 का उल्लेख न करना।

तथ्यों पर ज्यादा बहस करना: पुनरीक्षण में साक्ष्यों की नई गवाही या नए तथ्यों (New Facts) पर बहस नहीं की जा सकती, केवल विधिक त्रुटि पर ध्यान दें।

प्रमाणित प्रति के बिना आवेदन: बिना प्रमाणित प्रति के याचिका दाखिल करना, जिससे डिफेक्ट (Defect) निकल सकता है।

अपील और पुनरीक्षण का संलयन: जहाँ स्पष्ट अपील का प्रावधान हो (जैसे दोषसिद्धि के मामले में), वहाँ पुनरीक्षण दाखिल कर देना।

7. सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. क्या पुनरीक्षण याचिका निचली अदालत के बरी करने (Acquittal) के आदेश के खिलाफ दायर की जा सकती है?

उत्तर: हाँ, धारा 438 BNSS के तहत पीड़ित (Victim) या राज्य सरकार बरी करने के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण दायर कर सकती है, लेकिन न्यायालय आमतौर पर इसमें बहुत सावधानी बरतते हैं।

Q2. क्या पुनरीक्षण दाखिल करने के लिए कोई समय सीमा (Limitation Period) है?

उत्तर: वैधानिक रूप से पुनरीक्षण के लिए कोई निश्चित सीमा अधिनियम की धारा तय नहीं है, लेकिन उच्च न्यायालय के नियमों के अनुसार इसे बिना किसी अनुचित देरी के (सामान्यतः 90 दिनों के भीतर) दाखिल किया जाना चाहिए।

Q3. क्या सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों में एक साथ पुनरीक्षण दायर किया जा सकता है?

उत्तर: नहीं। पुनरीक्षणकर्ता के पास विकल्प होता है कि वह या तो सत्र न्यायालय जाए या उच्च न्यायालय। एक ही आदेश के विरुद्ध दोनों जगह याचिका नहीं चल सकती।

Q4. क्या पुनरीक्षण के दौरान गिरफ्तारी पर स्वतः रोक (Automatic Stay) लग जाती है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। पुनरीक्षण दाखिल करने मात्र से कोई रोक नहीं लगती। इसके लिए याचिका में विशेष रूप से अंतरिम राहत (Interim Stay) की मांग करनी पड़ती है और न्यायालय को संतुष्ट करना पड़ता है।

Q5. क्या अंतरिम आदेश (Interlocutory Order) के खिलाफ पुनरीक्षण हो सकता है?

उत्तर: नहीं। धारा 438(2) BNSS स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि किसी भी अंतरिम आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं होगी, सिवाय उन मामलों के जहाँ उस आदेश से मामला पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

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